मग़रीबपरस्त लोगों द्वारा अक्सर ही कभी हमारी संस्कृति को दकियानूसी बताया जाता है तो कभी उसकी प्राचीनता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिए जाते हैं| मगर उसकी गहराई में जाकर उसे समझने का प्रयास वे नहीं करते, पता नहीं क्यूँ? शायद इसलिए के ये उनकी संकीर्ण बुद्धि में समाने के लिए अत्यधिक विस्तृत और उनके हिसाब से जटिल है| अगर ये कहा जाये के हमारे अपने ही हमारे दुश्मन हैं तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की मुखालिफत करने वाले उसे झुठलाने की नित नई तरकीबें और कुतर्क खोजते रहते हैं| उदाहरण के लिए आज के युग की मिसाइलों का उल्लेख हमारे ग्रंथों में अग्निबाण के रूप में मिलता है परन्तु उन ग्रंथों कि प्रामाणिकता पर ही प्रश्न उठा दिए जाते हैं| भारत और श्रीलंका को जोड़ने वाले रामसेतु को हिन्दुस्तानी हुकूमत के हुक्मरानों ने ही देश के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष झुठलाने का दुस्साहस किया यहाँ तक की देश की बहुसंख्य जनता की आस्था एवं गहन श्रद्धा को कोरा झूठ और कपोल कल्पना करार दिया| जबकि नासा के उपग्रहीय चित्रों एवं संरचनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ कि सेतु एक मानव निर्मित संरचना है तथा उसकी आयु हमारे पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित त्रेता युग के तथाकथित समय से मेल खाती है|
ऐसी परिस्थिति में प्राचीन ज्ञान-विज्ञान का प्रसार तो दूर उसका संरक्षण ही अत्यंत दुष्कर प्रतीत हो रहा है| जिसे पाने में कई युग लग गए हों उसे खोने में कुछ क्षण भी नहीं लगते| भारतीय मेधा की कुशाग्रता ही हमारे ज्ञान की विलुप्ति का सबब बन गई है| अपनी अद्वितीय स्मरण क्षमता के कारण सदियों तक हमारा ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मौखिक रूप से हस्तांतरित होता रहा पर लिपिबद्ध नहीं किया गया| जब वह सब लिपिबद्ध किया गया तो उसी समय को उस ज्ञान की उत्पत्ति का समय मान लिया गया जो सर्वथा अनुचित है|
हमारे आध्यात्म के विषय वास्तविकता में एक परिष्कृत विज्ञान हैं जिन्हें पूरी तरह से समझना आज के आधुनिक विज्ञान के वश में नहीं| हमारे त्योहारों के पीछे भी अनेक ठोस वैज्ञानिक और तार्किक कारण छुपे हुए हैं जिनमें से कुछ का उल्लेख यहाँ पर करना आवश्यक है| ये पर्व जो हमारी संस्कृति में आदि काल से अनवरत चले आ रहे हैं, इनका सिर्फ़ आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक महत्व नहीं है| बहरहाल, वैज्ञानिक कारणों की बात करने से पहले ये बताना भी ज़रूरी है कि हमारी सनातन परंपरा सबको साथ ले कर चलने की रही है वो चाहे – क़ुदरत हो, पशु-पक्षी हों या दूसरे समुदाय और उनकी रवायतें हों| सबको अपना बना लेना, सबका अपना लेना, सबको और सबकुछ आत्मसात कर लेना पर उसके बावजूद अपनी विशिष्ट पहचान बनाये रखना, यही हमारी हिन्दुस्तानी तहज़ीब की वास्तविक पहचान है| आईये पर्वों पर एक दृष्टि डालें| दशहरा जैसा कि हम जानते हैं कि बरसात खत्म होने के कुछ बाद आता है, ठीक इसी वक़्त मानसून भी लौट रहा होता है जो कीड़े-मकोड़ों के पनपने का बिलकुल मुफ़ीद मौसम है| दशहरे के रावण के साथ समस्त कीट पतंगे भी जल कर खाक हो जाते हैं और बचे-खुचे पूरे कार्तिक मास के दीप प्रज्ज्वलन और ख़ास तौर से दीपावली के दिन असंख्य दीपक जला कर हम सभी कीटों को आकृष्ट कर लेते हैं जो उन्ही दीपों के लौ में जलकर समाप्त हो जाते हैं तथा हमारा वातावरण फिर शुद्ध हो जाता है| मकर संक्रांति ग्रीष्म ऋतु के आगमन की पूर्वसूचक है| जैसे होली को ही ले लें – होली के आगमन के वक़्त सर्दी अपने समाप्ति पर होती है| सर्दियाँ में अक्सर लोग स्वच्छता के प्रति सजग नहीं रह पाते| आज क़ुदरत के साथ की गयी छेड़खानी के कारण भले ही मौसम का चक्र उलट-पुलट गया हो पर जब हमारी संस्कृति ने अपना स्वरुप ग्रहण किया तब सब ठीक था| होली के समय हलकी ठण्ड होती थी जैसा हमने भी अपने बचपन में महसूस किया और देखा है| अनेक लोग ऐसे होते हैं जो सर्दियों में नहाने से बचते हैं और ये शरीर को रोगी बनाने की तरफ उठाया गया क़दम होता है| होलिका दहन के वक्त एक बड़ा अलाव हमारे सामने होता है जो सर्दी के दो-तीन महीनों की साडी कसर निकल देता है| शरीर पर सरसों का उबटन लगाकर फिर उसे निकाल देने से शरीर स्वच्छ हो जाता है| अगले दिन एक-दूसरे को इस तरह से रंगों में सराबोर कर दिया जाता है के न चाह कर भी हर कोई रगड़-रगड़ कर नहाने के लिए मजबूर हो जाता है, जो फिर से देह को स्वच्छ और निरोग कर देता है| हमारे अन्य प्रमुख त्यौहारों के माने जाने के पीछे भी ऐसी ही तमाम वैज्ञानिक वजहें हैं, जिनका यहाँ वर्णन करना संभव नहीं|
त्योहारों के अलावा हमारी रोज़मर्रा की ज़रूरत के सामान जो हमारे आसपास, हमारे घर, बगीचों, रसोईयों वगैरह में आदि काल से मौजूद हैं, उनके होने का भी ठोस वैज्ञानिक कारण है|नीम, हल्दी, तुलसी तथा मसाले इत्यादि अपनेआप में औषधि हैं| पूजा के चरणामृत में तुलसीदल शरीर को रोगमुक्त रखता है| आधुनिक शोध ने तुलसी को प्राकृतिक एंटी-बायोटिक साबित किया है जिसके आम अंग्रेज़ी औषधियों कि तरह कोई दुष्प्रभाव नहीं होते| हर घर में तुलसी का पौधा ज़रूर होता है| हल्दी स्वतः सिद्ध अचूक एंटी-सेप्टिक के तौर पर सदियों से मान्य है जिसका केवल लेप ही नहीं किया जाता बल्कि उसे खाया और पिया भी जा सकता है| एक दवा दो काम यानि मरहम भी और वटी भी| वहीं नीम अपने एंटी-बैक्टेरियल, एंटी-फंगल और रक्तशोधन के गुणों के कारण अनादि काल से हमारे समाज में प्रचलित रहा है|
कहने का तात्पर्य ये कि हमारे ऋषियों, मुनियों और ज्ञानियों ने हज़ारों साल पहले ही वो इल्म हासिल कर लिया था जिसे पाने के लिए आज भी आधुनिक विज्ञान भटक रहा है| और इसी कारणवश उसके अस्तित्व से इनकार करता है|
हमारे प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक विज्ञान में एक बुनियादी फ़र्क ये भी है कि आधुनिक विज्ञान विकास की प्रक्रिया में अनेक वर्जनाएं तोड़ डालता है जबके हमारा पुरातन ज्ञान अपनी मर्यादाओं के भीतर रहकर और प्रकृति के अद्वितीय सानिध्य में अर्जित किया गया है| हमारे पुरखों ने कभी क़ुदरत के साथ खिलवाड़ नहीं किया बल्के उसके साहचर्य में वक़्त गुज़ार कर उसके गूढ़ रहस्यों को जाना और अनावरणित किया है| हम यानि आधुनिक मानव इसके सर्वथा विपरीत हैं| ज़ाती खुदगर्जी के आगे घुटने टेके हमारी अंतरात्मा कलुषित हो गई है| इसी तरह आज सारी दुनिया के वैज्ञानिक सूक्ष्म गणितीय गणनाओं के लिए जटिल उपकरणों एवं सुपर-मेगा कंप्यूटरों का प्रयोग करते हैं वह कार्य हमारे ऋषि-मुनि प्राचीन काल से ही वैदिक प्रणाली, उपकरणों एवं वेधशालाओं के माध्यम से एकदम सटीकता से सुगमतापूर्वक करने में पूर्णरुपेण सक्षम थे|
हालांके हमारी संस्कृति में इन सब विषयों-वस्तुओं को आध्यात्म के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, विज्ञान से नहीं| इसके पीछे भी एक कारण यह है कि आध्यात्मिकता को अंगीकार करने के लिए आस्था मात्र की आवश्यकता है जो मनुष्य की सहज वृत्ति है जबकि विज्ञान साक्ष्य और तर्क की कसौटी पर तथ्यों को कसता है| ये सब हमारे ज्ञान-विज्ञान की प्राचीनता, उपयोगिता और यथार्थता को सिद्ध करते हैं और हम खुली आँखों वाले अन्धों के समान इन सब पर विश्वास करने में हिचकते हैं| बात मान्यताओं और कुरीतियों की आये तो धर्म के ठेकेदार और मज़हबी अलम्बरदार फ़ौरन उठ खड़े होते हैं और उन्हें अपनी तहज़ीब-संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं पे कुठाराघात होते हुए और उसका अपमान होता हुआ नज़र आने लगता है मगर इन ज़्यादा ज़रूरी चीज़ों के लिए बोलने की, उनकी बात उठाने की ज़हमत करने के लिए किसी के भी पास वक्त नहीं है| अब ज़रूरी है कुछ करना, सिर्फ सोचने से काम नहीं चलने वाला| अपनी महानता को आधुनिकता के परदे में छुपाने से हमें कुछ हासिल नहीं होने वाला| सच से मुंह मोड़ना किसी भी तरह से समझदारी नहीं कहा जा सकता|
इन सबसे परे हमारी संस्कृति में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम जिस प्राचीन शाश्वत परंपरा के वाहक हैं उसी को बिसरा रहे हैं, नकार रहे हैं| परन्तु जब हमारा वही प्राचीन ज्ञान-विज्ञान पाश्चात्य देशों द्वारा प्रमाणित और सिद्ध कर दिया जाता है तो वह हमारे लिए सहज स्वीकार्य हो जाता है| ये बेहद शर्मनाक और अफ़सोस के लायक है| अपनी परंपरा पर विश्वास करने और उसका निर्वाह करने के लिए किसी और के या दूसरों के प्रमाणन की आवश्यकता क्यूँ? अगर हम अब भी नहीं चेते तो इसका दुष्परिणाम हमें भुगतना ही होगा| एक ऐसा दुष्परिणाम जिससे होने वाली क्षति को सुधरने का हर प्रयास अपूर्त और निष्फल हो जायेगा|
ऐसी परिस्थिति में प्राचीन ज्ञान-विज्ञान का प्रसार तो दूर उसका संरक्षण ही अत्यंत दुष्कर प्रतीत हो रहा है| जिसे पाने में कई युग लग गए हों उसे खोने में कुछ क्षण भी नहीं लगते| भारतीय मेधा की कुशाग्रता ही हमारे ज्ञान की विलुप्ति का सबब बन गई है| अपनी अद्वितीय स्मरण क्षमता के कारण सदियों तक हमारा ज्ञान एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मौखिक रूप से हस्तांतरित होता रहा पर लिपिबद्ध नहीं किया गया| जब वह सब लिपिबद्ध किया गया तो उसी समय को उस ज्ञान की उत्पत्ति का समय मान लिया गया जो सर्वथा अनुचित है|
हमारे आध्यात्म के विषय वास्तविकता में एक परिष्कृत विज्ञान हैं जिन्हें पूरी तरह से समझना आज के आधुनिक विज्ञान के वश में नहीं| हमारे त्योहारों के पीछे भी अनेक ठोस वैज्ञानिक और तार्किक कारण छुपे हुए हैं जिनमें से कुछ का उल्लेख यहाँ पर करना आवश्यक है| ये पर्व जो हमारी संस्कृति में आदि काल से अनवरत चले आ रहे हैं, इनका सिर्फ़ आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक महत्व नहीं है| बहरहाल, वैज्ञानिक कारणों की बात करने से पहले ये बताना भी ज़रूरी है कि हमारी सनातन परंपरा सबको साथ ले कर चलने की रही है वो चाहे – क़ुदरत हो, पशु-पक्षी हों या दूसरे समुदाय और उनकी रवायतें हों| सबको अपना बना लेना, सबका अपना लेना, सबको और सबकुछ आत्मसात कर लेना पर उसके बावजूद अपनी विशिष्ट पहचान बनाये रखना, यही हमारी हिन्दुस्तानी तहज़ीब की वास्तविक पहचान है| आईये पर्वों पर एक दृष्टि डालें| दशहरा जैसा कि हम जानते हैं कि बरसात खत्म होने के कुछ बाद आता है, ठीक इसी वक़्त मानसून भी लौट रहा होता है जो कीड़े-मकोड़ों के पनपने का बिलकुल मुफ़ीद मौसम है| दशहरे के रावण के साथ समस्त कीट पतंगे भी जल कर खाक हो जाते हैं और बचे-खुचे पूरे कार्तिक मास के दीप प्रज्ज्वलन और ख़ास तौर से दीपावली के दिन असंख्य दीपक जला कर हम सभी कीटों को आकृष्ट कर लेते हैं जो उन्ही दीपों के लौ में जलकर समाप्त हो जाते हैं तथा हमारा वातावरण फिर शुद्ध हो जाता है| मकर संक्रांति ग्रीष्म ऋतु के आगमन की पूर्वसूचक है| जैसे होली को ही ले लें – होली के आगमन के वक़्त सर्दी अपने समाप्ति पर होती है| सर्दियाँ में अक्सर लोग स्वच्छता के प्रति सजग नहीं रह पाते| आज क़ुदरत के साथ की गयी छेड़खानी के कारण भले ही मौसम का चक्र उलट-पुलट गया हो पर जब हमारी संस्कृति ने अपना स्वरुप ग्रहण किया तब सब ठीक था| होली के समय हलकी ठण्ड होती थी जैसा हमने भी अपने बचपन में महसूस किया और देखा है| अनेक लोग ऐसे होते हैं जो सर्दियों में नहाने से बचते हैं और ये शरीर को रोगी बनाने की तरफ उठाया गया क़दम होता है| होलिका दहन के वक्त एक बड़ा अलाव हमारे सामने होता है जो सर्दी के दो-तीन महीनों की साडी कसर निकल देता है| शरीर पर सरसों का उबटन लगाकर फिर उसे निकाल देने से शरीर स्वच्छ हो जाता है| अगले दिन एक-दूसरे को इस तरह से रंगों में सराबोर कर दिया जाता है के न चाह कर भी हर कोई रगड़-रगड़ कर नहाने के लिए मजबूर हो जाता है, जो फिर से देह को स्वच्छ और निरोग कर देता है| हमारे अन्य प्रमुख त्यौहारों के माने जाने के पीछे भी ऐसी ही तमाम वैज्ञानिक वजहें हैं, जिनका यहाँ वर्णन करना संभव नहीं|
त्योहारों के अलावा हमारी रोज़मर्रा की ज़रूरत के सामान जो हमारे आसपास, हमारे घर, बगीचों, रसोईयों वगैरह में आदि काल से मौजूद हैं, उनके होने का भी ठोस वैज्ञानिक कारण है|नीम, हल्दी, तुलसी तथा मसाले इत्यादि अपनेआप में औषधि हैं| पूजा के चरणामृत में तुलसीदल शरीर को रोगमुक्त रखता है| आधुनिक शोध ने तुलसी को प्राकृतिक एंटी-बायोटिक साबित किया है जिसके आम अंग्रेज़ी औषधियों कि तरह कोई दुष्प्रभाव नहीं होते| हर घर में तुलसी का पौधा ज़रूर होता है| हल्दी स्वतः सिद्ध अचूक एंटी-सेप्टिक के तौर पर सदियों से मान्य है जिसका केवल लेप ही नहीं किया जाता बल्कि उसे खाया और पिया भी जा सकता है| एक दवा दो काम यानि मरहम भी और वटी भी| वहीं नीम अपने एंटी-बैक्टेरियल, एंटी-फंगल और रक्तशोधन के गुणों के कारण अनादि काल से हमारे समाज में प्रचलित रहा है|
कहने का तात्पर्य ये कि हमारे ऋषियों, मुनियों और ज्ञानियों ने हज़ारों साल पहले ही वो इल्म हासिल कर लिया था जिसे पाने के लिए आज भी आधुनिक विज्ञान भटक रहा है| और इसी कारणवश उसके अस्तित्व से इनकार करता है|
हमारे प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और आधुनिक विज्ञान में एक बुनियादी फ़र्क ये भी है कि आधुनिक विज्ञान विकास की प्रक्रिया में अनेक वर्जनाएं तोड़ डालता है जबके हमारा पुरातन ज्ञान अपनी मर्यादाओं के भीतर रहकर और प्रकृति के अद्वितीय सानिध्य में अर्जित किया गया है| हमारे पुरखों ने कभी क़ुदरत के साथ खिलवाड़ नहीं किया बल्के उसके साहचर्य में वक़्त गुज़ार कर उसके गूढ़ रहस्यों को जाना और अनावरणित किया है| हम यानि आधुनिक मानव इसके सर्वथा विपरीत हैं| ज़ाती खुदगर्जी के आगे घुटने टेके हमारी अंतरात्मा कलुषित हो गई है| इसी तरह आज सारी दुनिया के वैज्ञानिक सूक्ष्म गणितीय गणनाओं के लिए जटिल उपकरणों एवं सुपर-मेगा कंप्यूटरों का प्रयोग करते हैं वह कार्य हमारे ऋषि-मुनि प्राचीन काल से ही वैदिक प्रणाली, उपकरणों एवं वेधशालाओं के माध्यम से एकदम सटीकता से सुगमतापूर्वक करने में पूर्णरुपेण सक्षम थे|
हालांके हमारी संस्कृति में इन सब विषयों-वस्तुओं को आध्यात्म के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, विज्ञान से नहीं| इसके पीछे भी एक कारण यह है कि आध्यात्मिकता को अंगीकार करने के लिए आस्था मात्र की आवश्यकता है जो मनुष्य की सहज वृत्ति है जबकि विज्ञान साक्ष्य और तर्क की कसौटी पर तथ्यों को कसता है| ये सब हमारे ज्ञान-विज्ञान की प्राचीनता, उपयोगिता और यथार्थता को सिद्ध करते हैं और हम खुली आँखों वाले अन्धों के समान इन सब पर विश्वास करने में हिचकते हैं| बात मान्यताओं और कुरीतियों की आये तो धर्म के ठेकेदार और मज़हबी अलम्बरदार फ़ौरन उठ खड़े होते हैं और उन्हें अपनी तहज़ीब-संस्कृति और धार्मिक मान्यताओं पे कुठाराघात होते हुए और उसका अपमान होता हुआ नज़र आने लगता है मगर इन ज़्यादा ज़रूरी चीज़ों के लिए बोलने की, उनकी बात उठाने की ज़हमत करने के लिए किसी के भी पास वक्त नहीं है| अब ज़रूरी है कुछ करना, सिर्फ सोचने से काम नहीं चलने वाला| अपनी महानता को आधुनिकता के परदे में छुपाने से हमें कुछ हासिल नहीं होने वाला| सच से मुंह मोड़ना किसी भी तरह से समझदारी नहीं कहा जा सकता|
इन सबसे परे हमारी संस्कृति में सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हम जिस प्राचीन शाश्वत परंपरा के वाहक हैं उसी को बिसरा रहे हैं, नकार रहे हैं| परन्तु जब हमारा वही प्राचीन ज्ञान-विज्ञान पाश्चात्य देशों द्वारा प्रमाणित और सिद्ध कर दिया जाता है तो वह हमारे लिए सहज स्वीकार्य हो जाता है| ये बेहद शर्मनाक और अफ़सोस के लायक है| अपनी परंपरा पर विश्वास करने और उसका निर्वाह करने के लिए किसी और के या दूसरों के प्रमाणन की आवश्यकता क्यूँ? अगर हम अब भी नहीं चेते तो इसका दुष्परिणाम हमें भुगतना ही होगा| एक ऐसा दुष्परिणाम जिससे होने वाली क्षति को सुधरने का हर प्रयास अपूर्त और निष्फल हो जायेगा|
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