Friday, January 14, 2011

अर्थ बनाम सृजन: रूपया या रचनात्मकता

दो दिन पहले अखबार में प्रकाशित एक विज्ञापन पढ़ा जो बिहार सरकार की तरफ से दिया गया था| “बिहार सरकार ने निश्चय किया है की राज्य का एक राज्य गीत होना चाहिए जिससे उसके इतिहास, परंपरा और गौरव की झलक मिलती हो और बिहार की मिटटी की खुशबु हो| साथ स्कूलों में गाये जाने के लिए एक प्रार्थना भी लिखी जानी है| दोनों ही गीत गेय पदों में लिखित होने चाहिए एवं निर्धारित अवधि के (दो मिनट/तीन मिनट)होने चाहिए| गीतों का चयन राज्य सरकार द्वारा गठित एक समिति स्वतंत्र रूप से करेगी| पुरस्कार के रूप में एक-एक लाख रुपये हैं| एक रचनाकार से केवल एक रचना प्रति श्रेणी अपेक्षित है|”
विज्ञापन पढ़ कर मन में विचार कौंधा| एक लाख रुपये!! छोटा मोटा कवि तो मैं भी अपने आपको समझने का गुमान तो रखता ही हूँ, ऊपर से १+१ = २ लाख रुपये! आह वाह! तुरंत ही कल्पना में सुन्दर और मनभावन दृश्य तैरने लगे..|एक बड़ा सा मंच है… तमाम विशिष्ट लोग उसपर आरूढ़ हैं| मैं सम्मानित हो रहा हूँ..अंगवस्त्रम और चेक के साथ| धड़ाधड़ फोटुएं खींची जा रही हैं| वातावरण करतल ध्वनियों से गुंजायमान हो रहा है| कि अचानक…तन्द्रा टूटती है| मैं अभी भी वहीँ बैठा हूँ और मेरे हाथ में अखबार का वही पन्ना खुला हुआ है| कुछ संतुष्टि भी हुई और कुछ अपने ही ऊपर मैं हंसा भी| चलिए खैर.. इससे आगे बढ़ते हैं|
एक-एक लाख का पुरस्कार अभी भी विचारों के ऊपर हावी है| उठकर गुसलखाने के लिए चलता हूँ तो एक लाख रूपये आँखों के सामने तैरते रहते हैं| शावर के नीचे खड़ा होता हूँ तो पानी की जगह सिक्के गिरते नज़र आ रहे हैं| हूँ चेतनावस्था में पर अवचेतन तो बारम्बार उधर ही खींचे लिए जा रहा है|चलिए निवृत्त होकर नाश्ते की मेज़ की ओर चला हूँ.. नीचे मोज़ाएक के फर्श पर सैंकड़ों-हज़ारों छोटे-छोटे टुकड़े मुझे अलग-अलग श्रेणियों के ५,१०,२०,५०,१००,५००,१००० के नोट और सिक्के नज़र आ रहे हैं|ये क्या हो रहा है… मैं किस संसार में हूँ.. ऐसा क्या अद्भुत घटित हो गया है मेरे साथ जो सब कुछ बदला हुआ दिखाई दे रहा है? विचारों में खोया मैं बैठ जाता हूँ| चाय का कप भी मुझे अब चांदी का नज़र आने लगा है| सोने के चम्मच से पहला निवाला उठता हूँ तो हरी मटर की जगह मोती के दाने द्रष्ट हो रहे हैं| इस छोटे से सरकारी विज्ञापन ने मेरी दशा और दिशा दोनों ही बदल दी है|
विचार सुन्दर होते चले जा रहे हैं| मैं देखता हूँ कि परमाणु निशस्त्रीकरण होने को है, पाकिस्तान हमारे आगे घुटने टेके रहम की भीख मांग रहा है, चीन दरवाज़े पर खड़ा मित्रता की गुहार लगा रहा है, अमेरिकी राष्ट्रपति हमारे प्रथम नागरिक के यहाँ पानी भरने की ड्यूटी पर लग गए हैं,देश से कुपोषण का नामोनिशान मिट गया है.. पोलियो उन्मूलन हो चुका है| अब कहीं दंगे नहीं होते, सहिष्णुता और भाईचारा अपनी पराकाष्ठा पर हैं| दहेज के लिए स्त्रियों को जलाना पुरातीत हो गया है| भारत फिर विश्वगुरु की पदवी धारण कर चुका है|अचानक फिर तन्द्रा टूटती है.. सबकुछ वैसा ही है जैसा मैं कुछ मिनट पहले यहाँ छोड़कर स्वप्नलोक में विचरण करने चला गया था|
अब फिर से वास्तविकता के धरातल पर हूँ लेकिन ये एक लाख रुपये अभी भी मेरा पीछा नहीं छोड़ रहे|घूमफिर कर विचार फिर वहीँ केंद्रित हो जा रहे हैं|अंततः अर्थ पूरी तरह से हावी हो कर विद्या के साधनों पर चरम दबाव डाल रहा है और मैं उसके वशीभूत कलम और कागज़ लिए बैठ जाता हूँ|अब कोशिश चालू है| अपने दिमागी घोड़ों को दौड़ाने लगा हूँ| मगर कुछ सूझ ही नहीं रहा| एक रचनाकार का प्रेरणापरक हृदय सर्वप्रथम प्रेरणा मांग रहा है उसके बगैर रचना संभव नहीं| मगर दिमाग में ५०० और १००० के नोट परिक्रमण कर रहे हैं| मैं चाहता हूँ कि शब्द उमड़ कर आयें लेकिन मुझे एक लाख का चेक ही नज़र आता है| मैं इस कशमकश में फंसा हुआ हूँ| आज क्या हो गया है मुझे? यूँ तो एक से एक सुन्दर शब्दों की लहरें हिलोरें मारती रहती हैं मगर आज उस ज्वार का कोई अतापता नहीं| बस भाटा ही भाटा है किनारे से देखने पर सिर्फ़ पथरीली ज़मीन दिखाई दे रही है जिस पर चलना संभव नहीं| वही एक लाख रुपये मुझसे जबरन रचना कराना चाहते हैं और जब प्रयास करता हूँ तो मुझे घेर लेते हैं मेरी सृजनात्मकता के आकाश पर अर्थ के बादल उमड़ने घुमड़ने लगते हैं और प्रेरणा का सूरज मेरी दृष्टि से ओझल हो जाता है|यह कैसा अनोखा विरोधाभासी क्षण है! अपने आप को संयमित करता हूँ| धीरे-धीरे कुछ देर में सब कुछ सामान्य होने लगता है लेकिन वो एक लाख रुपये अब भी कहीं न कहीं से एक बार आकर मन के दरवाज़े पर दस्तक दे जा रहे हैं| हर थोड़े अंतराल पर एक आवाज़ आती है,”भईया, हमें मत भूल जाना. जिस महान साहित्य के सृजन में तुम लगे हो उसका फल तो हम ही हैं.. यदि हम न मिले तो तुम्हारा साहित्य महान नहीं कहलायेगा|” दबाव लगातार बना हुआ है और मैं उस शाश्वत साहित्य की रचना में लगा हुआ हूँ जिसके विचार मात्र से विश्व भर की समस्याएं समाप्त हो गयी थीं| कागज़ पर ध्यान केंद्रित करता हूँ.. ज़हन से कुछ अल्फाज़ उभर कर आते हैं.. कड़ियाँ बनने लगती हैं.. कुछ पंक्तियाँ तैयार हो रही हैं… काफ़ी देर की जद्दोजहद के बाद कुछ पढ़ने लायक दिखाई पड़ता है लेकिन जैसे ही उसका पुनरावलोकन करने चलता हूँ मेरी आदि समस्या यथावत आकर खड़ी हो जाती है.. शब्दों को देखता हूँ तो सौ, वाक्यों में पांच सौ और छंदों में हज़ार-हज़ार के नोट नज़र आने लगते हैं| हाय रे कवि मन! तू ऐसा क्यूँ है? आजतक निःस्वार्थ भावना से साहित्य सृजन में लगा रहा तो क्या कुछ नहीं लिख डाला तुने और आज जब कुछ मिलने की बारी आई तो तेरी बुद्धि,भावना,प्रेरणा, सृजनशीलता आदि को सांप सूंघ गया|रे अभागे! क्या यही तेरी नियति है? तेरी सारी विद्या आज निष्फल होने की कगार पर खड़ी है|
कुछ देर पहले तक रंगीन दिख रही दुनिया अचानक स्याह और काली नज़र आने लगी है| लग रहा है कि अरबों खरबों के नोटों से बना एक विकराल राक्षस मुझे निगलने को दौड़ा चला आ रहा है.. वह मुंह खोलता है तो लाखों के सिक्के तीव्र गति से निकल कर आस पास कि हर वस्तु को तहसनहस करते हुए सारे आलम पर छाते चले जा रहे हैं|मैं सर से पाँव तक मुद्रापाश में आबद्ध हूँ| भागने का कोई चारा नहीं| विवश मैं| आँखों के आगे अँधेरा छाने लगता है और मैं बेहोश होने लगता हूँ..| सहसा फिर मेरी तन्द्रा टूटती है| अब मेरे विचारों में राज्य गीत और प्रार्थना की जगह अपनी विवशता का चिंतन-मनन सर उठा रहा है| कुछ ही देर में अर्थतंत्र पुनः विचारों के धरातल से मनन-चिंतन के पौधों को, जो अभी अभी पल्लवित हुए हैं, उखाड़ कर फ़ेंक देता है और फिर से कलम लेकर बैठ जाता हूँ… शब्द तो अभी भी नहीं सूझ रहे हैं.. ना ही कोई तुकें फ़िट बैठ रही हैं.. फिर कोशिशें जारी हैं| अर्थ बनाम सृजन का रचनात्मक अंतर्द्वंद चल रहा है जिसमें अभी तक तो अर्थ का ही पलड़ा भारी है.. सृजन कोने में खड़ा अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहा है| देखिये क्या परिणाम होता है|

No comments:

Post a Comment