न कोई ख़ूबसूरत इतना जिसे देखूं मैं खो जाऊं;
न कोई दूजा के मैं इन जज़्बों को दोहराऊँ-संजो जाऊं;
तेरे दीदार का एक लम्हा बहुत है क़ीमती ‘वाहिद’,
उन अनमोल लम्हों को भला कैसे मैं खो जाऊं;
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हर एक शै की मुझसे बेरूख़ी सी लग रही है,
हसीं मौसम में भी कुछ कमी सी लग रही है,
अपनी साँसे भी नेमत और किसी की लग रही है
‘वाहिद’ये ज़िंदगी अचानक अजनबी सी लग रही है;
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अशआर = शेर का बहुवचन
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